
रायपुर। पिता ने मरते समय कहा था कि बेटे को अफसर बनाने के लिए मकान बेच देना। लेकिन मां ने अपने लाडले को अफसर बनाने के लिए दवाई दुकान में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी की और पैसे जुटाकर मंजिल तक पहुंचाया। कहानी छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव में पदस्थ एक प्रशिक्षु आइपीएस मयंक गुर्जर की है।
2020 बैंच के आइपीएस मयंक मध्यप्रदेश के हरदा जिले के खिलकिया तहसील के डेडगांव निवासी है। उनका आइपीएस बनाने का सफर आसान नहीं था। साल 2014 में 12वीं की वार्षिक परीक्षा से महज सात दिन पहले पिता गोविंद गुर्जर का निधन हो गया। वे इंदौर में एक निजी कंपनी में अकाउंटेट थे। मयंक की माता प्रेमलता गुर्जर ने हार नहीं मानी। मयंक को पढ़ाने के लिए प्रेमलता ने इंदौर के दवा बाजार में रिसेप्शनिस्ट (स्कीरकीपर) का काम शुरू कर दिया। जहां शिक्षा और घर चलाने के लिए पैसे जुटाकर बेटे को मंजिल तक पहुंचाया।
चर्चा करते हुए प्रेमलता ने बताया कि मयंक के पिता ने आखरी क्षणों में कहा कि मयंक का सपना पूरा करने के लिए पढ़ाई को रोकना मत। क्यों न घर ही बिक जाए। मयंक को एक अफसर के रूप में देखना चाहता हूं। ठीक उसी दिन से ठान लिया कि मयंक को उच्च शिक्षा दिलाकर रहेंगे। मयंक ने भी माता-पिता के सपने को सकार करने के लिए खूब मेहनत की। अंतत: यूपीएससी में पहले ही प्रयास में 455वीं रैंक हासिल कर आइपीएस बन गए।
मयंक ने 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 2015 में मुंबई इंडियन इंस्टिट्यूट आफ टेक्नोलाजी (आइआइटी) में चयन होकर ग्रेजुएशन की पढ़ाई केमिकल इंजीनियरिंग में पूरी की। इस दौरान मयंक ने कालेज की लाइब्रेरी में पांच से सात घंटे यूपीएससी परीक्षा की तैयारी की। दोस्तों से दूरी बढ़ाई। वहीं खुद कालेज के विद्यार्थियों को पढ़ाकर केमिस्ट्री के एक पेपर की स्वयं ट्यूशन ली।







