Friday, October 23, 2026

Bastar Dussehra 2026: नवाखाई की शर्त पूरी होने पर राजा को लौटाया विजय रथ, 55 गांवों के माड़िया समुदाय ने निभाई परंपरा

जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे के तहत बाहर रैनी की पारंपरिक रस्म पूरी की गई। नवाखाई की शर्त पूरी होने के बाद कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपाकर रखा गया आठ पहियों वाला विजय रथ राज परिवार को लौटा दिया गया। इस रस्म के लिए कमलचंद्र भंजदेव को राजसी ठाठ-बाट के साथ गांव बुलाया गया, जहां उन्हें नए चावल और देसी गाय के दूध से बनी खीर खिलाई गई। इसके बाद ग्रामीणों ने रस्सियों के सहारे विजय रथ को खींचकर राजमहल तक पहुंचाया।

इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग जुटे। बस्तर दशहरे की इस ऐतिहासिक रस्म को देखने डेनमार्क और फ्रांस से भी पर्यटक पहुंचे।

नवाखाई की रस्म के बाद वापस मिला विजय रथ

बस्तर दशहरे में बाहर रैनी की रस्म के दौरान राजा और ग्रामीणों के बीच सदियों से चली आ रही परंपरा निभाई जाती है। इसके तहत ग्रामीण विजय रथ को राजमहल के सामने से अपने कब्जे में लेकर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा देते हैं। इसके बाद राज परिवार के सदस्य को ग्रामीणों के साथ नवाखाई की रस्म पूरी करनी होती है।

परंपरा के अनुसार, कमलचंद्र भंजदेव ने ग्रामीणों के साथ बैठकर नए चावल से बनी खीर खाई। नवाखाई की रस्म पूरी होने के बाद ग्रामीणों ने विजय रथ लौटाने की परंपरा निभाई। इस दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की गई और मां दंतेश्वरी को भोग अर्पित किया गया।

रूठे ग्रामीणों को मनाने राजसी ठाठ-बाट से पहुंचे राजा

बस्तर दशहरे की भीतर रैनी और बाहर रैनी की रस्मों का विशेष महत्व है। परंपरा के तहत ग्रामीण प्रतीकात्मक रूप से राजा से रूठकर विजय रथ अपने कब्जे में ले लेते हैं। इसके बाद राज परिवार के सदस्य ग्रामीणों को मनाने के लिए पूरे राजसी ठाठ-बाट के साथ गांव पहुंचते हैं।

ग्रामीणों की ओर से नवाखाई की शर्त रखी जाती है। इसे पूरा करने के बाद ही विजय रथ वापस लौटाया जाता है। इस वर्ष भी कमलचंद्र भंजदेव पारंपरिक तरीके से ग्रामीणों के बीच पहुंचे और उनके साथ नवाखाई की रस्म निभाई।

कमलचंद्र भंजदेव के अनुसार, इस बार नवाखाई के लिए बस्तर रियासत की जमीन पर उपजे नए चावल और देसी गाय के दूध से खीर तैयार की गई। यह परंपरा राज परिवार और ग्रामीणों के बीच आपसी संबंधों तथा पारंपरिक व्यवस्था का प्रतीक मानी जाती है।

55 गांवों के माड़िया समुदाय की अहम भूमिका

करीब 618 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा में किलेपाल, बास्तानार सहित 55 गांवों के माड़िया समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। समुदाय के ग्रामीण आठ पहियों वाले विजय रथ को राजमहल के सामने से ले जाकर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा देते हैं।

इसके बाद नवाखाई की रस्म पूरी होने पर विजय रथ वापस लाया जाता है। पहले राजा को हाथी-घोड़ों के साथ राजसी ठाठ-बाट में कुम्हड़ाकोट पहुंचाने की परंपरा थी। इस बार भी कमलचंद्र भंजदेव घोड़े वाले रथ के साथ पहुंचे।

रस्म पूरी होने के बाद ग्रामीणों ने रस्सियों के सहारे विजय रथ को खींचकर राजमहल तक पहुंचाया। परंपरा के अनुसार, राजा रथ के आगे चले और ग्रामीण पीछे से रथ खींचते हुए राजमहल पहुंचे।

बस्तर दशहरे की अनूठी परंपरा देखने उमड़ी भीड़

बस्तर दशहरा केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं, बल्कि स्थानीय जनजातीय संस्कृति, सामाजिक एकता और परंपराओं का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है। बाहर रैनी की रस्म में ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी और विजय रथ की वापसी इस आयोजन को विशिष्ट बनाती है।

हर साल की तरह इस बार भी हजारों लोगों ने इस परंपरा को करीब से देखा। विदेशी पर्यटकों की मौजूदगी ने भी बस्तर की सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों की रुचि को दर्शाया।