
नीतीश कुमार ने आज यानी 10 अगस्त को आठवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। बीजेपी नेतृत्व वाले NDA से नाता तोड़ने के बाद उन्होंने 9 अगस्त को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। अब राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन के जरिए वह फिर से CM पद पर काबिज हो गए हैं।
बीजेपी से नाता तोड़ना हो या जोड़ना या फिर आरजेडी के साथ आना और उससे अलग होना, नीतीश के लिए ये कोई नई बात नहीं है। पिछले करीब तीन दशक के दौरान बीजेपी और आरजेडी के साथ नीतीश के रिश्ते कई बार बने और बिगड़े हैं। यूं कहें कि पिछले करीब तीन दशकों में कम से कम 4 बार नीतीश का हृदय परिवर्तन हो चुका है।
बीजेपी और आरजेडी से गठबंधन तोड़ने के लिए नीतीश का दो चर्चित C का फॉर्मूला रहा है। C-यानी कम्युनलिज्म या सांप्रदायिकता, जिसे नीतीश बीजेपी से गठबंधन तोड़ने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं। वहीं C-यानी करप्शन, जिसका इस्तेमाल वे आरजेडी से गठबंधन तोड़ने के लिए कर चुके हैं।
1985 में नीतीश ने जनता दल से राजनीति में एंट्री मारी
1 मार्च 1951 को बिहार के बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश कुमार ने 1972 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली थी। एक इंटरव्यू में नीतीश ने कहा था, उन्होंने अधूरे मन से स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की नौकरी जॉइन की, लेकिन पहला ही दिन उनका आखिरी दिन साबित हुआ क्योंकि शुरू से ही उनका मन राजनीति में लगता था।
अपनी राजनीति के शुरुआती दिनों में उन्होंने राममनोहर लोहिया, एसएन सिन्हा, कर्पूरी ठाकुर और वीपी सिंह जैसे दिग्गज नेताओं के साथ काम किया। 1985 में वह सत्येंद्र नारायण सिन्हा की अध्यक्षता वाले जनता दल से जुड़े और इसी साल पार्टी के टिकट पर हरनौत से विधायक चुने गए।
1989 में लालू से दोस्ती और 5 साल बाद बगावत
जनता दल में अपने शुरुआती वर्षों में नीतीश कुमार ने 1989 में बिहार विधानसभा में लालू प्रसाद यादव का नेता विपक्ष के तौर पर समर्थन किया था। नीतीश और लालू एक-दूसरे को कॉलेज के दिनों से ही जानते थे। बाद में दोनों ही जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े थे।
मार्च 1990 में लालू प्रसाद यादव जब बिहार के पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तो उसमें नीतीश कुमार ने अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन लालू से उनकी ये दोस्ती ज्यादा दिन टिक नहीं पाई।
1994 में नीतीश ने लालू के खिलाफ बगावत कर दी। इसकी वजह ये थी कि उन दिनों जनता दल पर लालू का नियंत्रण था। लालू का साथ छोड़ नीतीश ने जॉर्ज फर्नांडीज के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन किया था।
1996 में भाजपा से पहली बार हाथ मिलाया, केंद्र में मंत्री बने
नीतीश ने 1996 में पहली बार बीजेपी से हाथ मिलाया और अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। उसी साल जनता दल अध्यक्ष शरद यादव और लालू प्रसाद यादव के बीच मनमुटाव हो गया, जिसके बाद लालू ने राष्ट्रीय जनता दल के नाम से नई पार्टी बना ली।
2000 से 2010 तक BJP के समर्थन से 3 बार CM बने
नीतीश 3 मार्च 2000 को बीजेपी की अगुआई वाले NDA के समर्थन से पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने की वजह से 7 दिन बाद ही 10 मार्च को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। तब NDA ने 151 सीटें और लालू की आरजेडी और कांग्रेस गठबंधन ने 159 सीटें जीती थीं, लेकिन दोनों ही बहुमत के लिए जरूरी 163 सीटों से दूर रह गए थे।
दरअसल, उस समय तक बिहार विधानसभा में 324 सीटें थीं। नवंबर 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बनने के बाद अब बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं।
नीतीश कुमार की समता पार्टी ने 2003 में शरद यादव की जनता दल के साथ अपना विलय कर लिया। हालांकि नीतीश ने बीजेपी के साथ अपना गठबंधन जारी रखा। इस विलय से जनता दल यूनाइटेड का गठन हुआ, जिसके मुखिया बने नीतीश कुमार।
नीतीश ने 2005 विधानसभा चुनावों में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और पूर्ण बहुमत हासिल करते हुए 24 नवंबर 2005 को दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। नीतीश ने बीजेपी गठबंधन के साथ मिलकर 5 साल तक सरकार चलाई।
नीतीश और बीजेपी का गठबंधन 2010 विधानसभा चुनावों में भी जारी रहा और इन चुनावों में बहुमत हासिल करते हुए 26 नवंबर 2010 को नीतीश तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।
2013 में मोदी को सांप्रदायिक बताकर NDA से मुंह मोड़ा
नीतीश और बीजेपी का मजबूत गठबंधन करीब 17 साल बाद जून 2013 में पहली बार तब टूटा, जब बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनावों के लिए NDA की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया।
नीतीश ने उस समय बीजेपी से अलग होने के लिए कम्युनलिज्म यानी सांप्रदायिकता का हवाला दिया था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक नीतीश ने तब कहा था कि उन्होंने बीजेपी गठबंधन से नाता इसलिए तोड़ा था क्योंकि उनका मानना था कि NDA के पास ‘एक साफ-सुथरी और सेकुलर इमेज’ वाला नेता होना चाहिए था।
उस समय उन्होंने संघ-मुक्त भारत का भी आह्वान किया था। नीतीश ने तब ये भी कहा था, ”मिट्टी में मिल जाएंगे, बीजेपी के साथ वापस नहीं जाएंगे।”
2014 में आरजेडी और कांग्रेस का दामन थामा
बीजेपी से अलग होने के बाद 2013 में नीतीश ने आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया, लेकिन कुछ ही महीनों बाद मई 2014 में इस्तीफा दे दिया। तब करीब 6 महीनों के लिए जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने।
फरवरी 2015 में विधानसभा चुनावों से कुछ समय पहले मांझी की जगह नीतीश चौथी बार बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।
नीतीश ने 2015 का विधानसभा चुनाव आरजेडी और कांग्रेस से हाथ मिलाकर महागठबंधन बनाकर लड़ा। महागठबंधन ने 243 में से 178 विधानसभा सीटें जीतीं।
20 नवंबर 2015 को पांचवीं बार बिहार के CM बन गए। लालू के बेटे तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बने।
2017 में करप्शन के नाम पर RJD से किनारा, फिर से बीजेपी का हाथ थामा
दो साल के अंदर ही नीतीश के जेडीयू, कांग्रेस और आरजेडी से मिलकर बना महागठबंधन 2017 में टूट गया। वजह लालू के बेटे और डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव का नाम IRCTC घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग में सामने आया था।
इसके बाद आरजेडी पर करप्शन का आरोप लगाते हुए नीतीश ने गठबंधन से नाता तोड़ लिया और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। वह 24 घंटे के अंदर ही बीजेपी के समर्थन से फिर से मुख्यमंत्री बन गए।
नीतीश और बीजेपी का गठबंधन 2019 लोकसभा चुनावों तक ठीक चला और NDA ने अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए बिहार की 40 में से 39 लोकसभा सीटें जीत लीं।











