देश में चर्चा, अयोध्या में क्यों हारी भाजपा

यह फोटो 22 जनवरी रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के दिन की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर से आए VIPs से मुलाकात की थी।देशभर की निगाहें जिस अयोध्या पर थीं, वहीं भाजपा चुनाव हार गई। राम नगरी में मिले इस जनमत ने सबको चौंका दिया। 1990 की रथयात्रा से लेकर 2024 के चुनाव तक भाजपा के मूल में रहने वाली सीट पर पार्टी ने जी-जान से ताकत लगाई। हजार-दो हजार करोड़ नहीं, 32 हजार करोड़ के प्रोजेक्ट शुरू कराए।

राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा दुनियाभर में सुर्खियां बनीं। 500 साल पुराना इतिहास बदला गया। PM मोदी खुद यहां रोड-शो करने आए। योगी ने 5 जनसभाएं कीं। मगर सियासी जादू नहीं चला। जनता की नाराजगी अंदर ही अंदर मुखर हो रही थी।

भाजपा के स्थानीय नेताओं से लेकर आलाकमान तक उस तासीर को भांप नहीं पाए। मोदी को यहां के भाजपा नेता गुड मैनेजमेंट दिखाते रहे। मगर अंदरखाने कुछ और ही चल रहा था। विरोध की यह चिनगारी कैंडिडेट के फाइनल होते ही शुरू हो गई थी।

आखिर भाजपा अपने सबसे बड़े गढ़ में क्यों हारी, लोगों में क्या गुस्सा था? भाजपा हाईकमान आखिर जनता की नब्ज क्यों नहीं भांप पाए?भाजपा को वोट क्यों नहीं पड़ा? इस पर कहते हैं- लोग मोदी-योगी को पसंद करते हैं। राममंदिर से खुश हैं। मगर सांसद लल्लू सिंह से नाराज हैं। आप ऐसे समझिए कि जो 4.99 लाख वोट भाजपा को मिले हैं वे PM मोदी को मिले हैं, लल्लू सिंह को नहीं।वह इतने पर ही नहीं रुकते। कहते हैं, अयोध्या में 2 साल से लोग परेशान हैं। VIP तो आते हैं, मगर जो सड़कें बंद होती हैं, उनमें हम लोग फंसते हैं। लोग घरों में कैद हो जाते हैं। हमारे रिश्तेदार शहर के बॉर्डर पर फंस जाते हैं। अंदर नहीं आने दिया जाता। लोग परेशान हो गए थे, यही वजह है कि लोगों ने सपा को जिता दिया।भाजपा को गांव में कम वोट मिले हैं। शहर के लोगों ने वोट दिए हैं। इसकी वजह अफसरों की तानाशाही और सांसद की उदासीनता रही है। अफसरों को लगता है कि वो मुख्यमंत्री के सीधे संपर्क में हैं। लोगों की समस्याएं तक नहीं सुनते। गांव के लोग ज्यादा परेशान हैं। आप देख लीजिएगा, गांव के लोगों के वोट सपा को गए होंगे।