कोरबा. छत्तीसगढ़ में नगरीय निकाय चुनाव की मतगणना के लिए अब कुछ ही घंटे शेष हैं। सभी दलों और प्रत्याशियों की धड़कनें तेज हो गई हैं। कोरबा नगर निगम में पिछले दस वर्षों से कांग्रेस का वर्चस्व रहा है, लेकिन इस बार मुकाबला दिलचस्प हो गया है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपनी जीत की हैट्रिक पूरी करेगी या फिर बीजेपी नगर निगम में जोरदार वापसी करेगी?
कोरबा में इस बार मतदान प्रतिशत में गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2019 की तुलना में इस बार 4.5% कम मतदान हुआ। आमतौर पर मतदान प्रतिशत में वृद्धि सत्ता परिवर्तन का संकेत मानी जाती है, लेकिन यहां मतदान घटने के बावजूद कांग्रेस के लिए स्थिति अनुकूल नहीं लग रही। महिलाओं की कम भागीदारी, कांग्रेस के कार्यों से जनता की नाराजगी और पार्टी के अंदर गुटबाजी कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस ने इस बार बिना ठोस रणनीति के चुनाव लड़ा। बड़े नेता सक्रिय नहीं दिखे और न ही पार्टी में चुनाव को लेकर कोई खास उत्साह नजर आया। वहीं, दूसरी ओर बीजेपी ने पूरी तैयारी के साथ चुनावी मैदान में उतरकर कांग्रेस की कमजोरी का भरपूर फायदा उठाया।
बीजेपी ने इस बार अपनी महापौर प्रत्याशी संजू देवी राजपूत के पक्ष में पूरी ताकत झोंक दी। पार्टी ने चुनावी रणनीति के तहत घर-घर प्रचार और बूथ स्तर पर मजबूत पकड़ बनाई। मंत्री लखनलाल देवांगन ने खुद कमान संभाली, जिससे बीजेपी को सीधा लाभ मिलता दिख रहा है।
दूसरी ओर, कांग्रेस की कमान सांसद ज्योत्सना महंत के हाथों में थी, लेकिन स्थानीय नेता जयसिंह अग्रवाल ने कोरबा की बजाय चिरमिरी नगरीय निकाय पर ध्यान केंद्रित किया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि महंत और अग्रवाल गुटों में तालमेल की कमी के चलते कांग्रेस कमजोर हुई।





