सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित परसा कोल ब्लॉक के आदिवासी भू-विस्थापितों की याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली। हालांकि जस्टिस भूषण गवई और जस्टिस विक्रम नाथ की खंडपीठ ने कोल प्रोजेक्ट पर रोक लगाने की मांग को अस्वीकार कर दिया। लेकिन प्रकरण की सुनवाई जल्द करने की मांग को स्वीकार कर लिया। शुक्रवार को परसा कोल ब्लॉक को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।
11 मई को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं को बहुत देरी से दाखिल करने और मेरिट नहीं होने की बात कहकर खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। परसा कोल ब्लॉक का भूमि अधिग्रहण 2017-18 में कोल बेअरिंग एक्ट के तहत किया गया था। इसके विरोध में सरगुजा में मंगल साय और अन्य प्रभावित लोगों के द्वारा सितंबर 2020 में यह कहकर याचिका दायर की गई थी कि इस खदान का हस्तांतरण राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम ने निजी कंपनी को कर दिया है, जबकि कोल बेअरिंग एक्ट से केवल केंद्र सरकार की सरकारी कंपनी को ही जमीन अधिग्रहित हो सकती है।

साथ ही नए भूमि अधिग्रहण के प्रावधान लागू नहीं करने से प्रभावितों को बड़ा नुकसान हो रहा है। इसी तरह वन अधिकार कानून और पेसा अधिनियम की भी अवहेलना की गई है। ग्राम सभा के प्रस्ताव फर्जी तरीके से बनाए गए हैं और हाथी प्रभावित क्षेत्र में खाद्यान्न खोलना अनुचित है। इसके साथ ही अधिग्रहण प्रक्रिया में सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया है। इस प्रकरण की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 21 नवंबर को भी हुई थी। उस दिन कोर्ट ने कोल बेअरिंग एक्ट और नए भू-अधिग्रहण कानून के तहत अधिग्रहण से कैसे प्रभावितों को नुकसान होता है, इस पर अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने की अनुमति दी थी।

16 दिसंबर को हुई सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने बताया कि भू-अधिग्रहण कानून की धारा- 2 सी के तहत केवल भू स्वामी ही नहीं, बल्कि प्रभावित क्षेत्र के सभी लोग प्रभावित परिवार माने जाते हैं, लेकिन कोल बेअरिंग एक्ट में केवल भूमिधारी ही प्रभावित माना जाता है। इसके अलावा प्रभावित व्यक्ति की वन उत्पादों से होने वाली आय का अलग मुआवजा होता है और भूमिहीन और मजदूर को भी मुआवजा मिलना चाहिए। याचिकार्ताओं की ओर से उपस्थित वरिष्ठ वकील संजय पारिख ने अडानी के साथ संयुक्त कंपनी का मुद्दा उठाकर कहा कि कोल बेअरिंग एक्ट के तहत यह अवैध है और नए भूमि अधिग्रहण कानून में अनुसूची 5 क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण अंतिम विकल्प के रूप में करने का नियम है। इन सभी प्रावधानों की उपेक्षा की गई है।
केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और संयुक्त उपक्रम की और से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने याचिकाओं का विरोध किया। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं पर सुनवाई की अनुमति प्रदान करते हुए उन्हें सुनवाई के लिए स्वीकार किया, लेकिन प्रोजेक्ट पर रोक लगाने की मांग अस्वीकार करते हुए अंतिम सुनवाई जल्दी करने की मांग स्वीकार कर ली।











