Saturday, September 19, 2026

झीरम घाटी केस: NIA कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट आदिवासी समाज, 10 दोषियों की सजा को हाईकोर्ट में चुनौती की तैयारी

जगदलपुर। झीरम घाटी हत्याकांड मामले में NIA की विशेष अदालत द्वारा 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद अब आदिवासी समाज के एक वर्ग ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। जगदलपुर के परपा में हुई बैठक में बस्तर संभाग समेत करीब 6 से 7 जिलों से समाज के प्रतिनिधि और प्रभावित परिवारों के सदस्य शामिल हुए। बैठक में मौजूद लोगों ने दावा किया कि जिन लोगों को मामले में दोषी ठहराया गया है, वे झीरम घाटी की घटना में शामिल नहीं थे और उन्हें गलत तरीके से आरोपी बनाया गया है।

NIA की विशेष अदालत ने 5 सितंबर 2026 को 10 आरोपियों को दोषी ठहराया था। इसके बाद 16 सितंबर को अदालत ने सभी 10 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई।

हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती देने की तैयारी

आदिवासी समाज की बैठक में कहा गया कि गांवों में होने वाली बैठकों में ग्रामीणों का शामिल होना सामान्य सामाजिक प्रक्रिया है। समाज के प्रतिनिधियों का दावा है कि किसी बैठक में शामिल होने मात्र से किसी व्यक्ति को नक्सली गतिविधियों से जुड़ा नहीं माना जा सकता।

इसी आधार पर समाज ने मामले को आगे अदालत में चुनौती देने की तैयारी की है। बैठक में पहले हाईकोर्ट में अपील करने और जरूरत पड़ने पर आगे सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई जारी रखने की बात कही गई।

अदालत के फैसले के खिलाफ अपील का रास्ता खुला है। समाचार एजेंसी आकाशवाणी के अनुसार, NIA कोर्ट ने दोषियों को हाईकोर्ट में अपील के लिए 30 दिन का समय दिया है।

हर परिवार से 20 रुपये चंदा लेकर लड़ी जाएगी कानूनी लड़ाई

बैठक में कानूनी लड़ाई के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने का भी निर्णय लिया गया। समाज की ओर से हर गांव और प्रत्येक परिवार से 20 रुपये चंदा जुटाने की बात कही गई है।

समाज के प्रतिनिधियों के मुताबिक, इसी राशि से हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी। जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट तक मामला ले जाने की तैयारी भी की जाएगी।

प्रकाश ठाकुर बोले- निर्दोष लोगों को जेल में बंद किया गया

सर्व आदिवासी समाज के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने कहा कि प्रभावित परिवारों के साथ बैठक की गई है और समाज NIA कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं है।

उनका दावा है कि गिरफ्तार किए गए कुछ लोग घटना में शामिल नहीं थे और न ही वे नक्सली थे। ठाकुर के मुताबिक, प्रभावित परिवारों ने बैठक में बताया कि उनके परिवार के लोग घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं थे और आसपास के गांवों के लोगों को भी घटना की कोई जानकारी नहीं थी।

उन्होंने कहा कि झीरम घाटी की घटना बेहद दुखद थी, लेकिन समाज का मानना है कि मामले में गिरफ्तार किए गए सभी लोगों की भूमिका की दोबारा कानूनी समीक्षा होनी चाहिए।

2013 में हुआ था झीरम घाटी हमला

25 मई 2013 को बस्तर की झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर माओवादी हमला हुआ था। इस हमले में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं समेत बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी। NIA की विशेष अदालत ने 5 सितंबर 2026 को मामले में 10 आरोपियों को दोषी ठहराया और 16 सितंबर को उन्हें मृत्युदंड सुनाया।

अब आदिवासी समाज के एक वर्ग की ओर से फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी से झीरम घाटी मामले में कानूनी प्रक्रिया का अगला चरण शुरू होने की संभावना है।