रायपुर। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के संबलपुरी गांव से निकलकर अजय गुप्ता ने संघर्ष और मेहनत की मिसाल पेश की है। कभी जंगलों में तेंदूपत्ता तोड़कर परिवार का सहारा बनने वाला यह युवा आज भारतीय वन सेवा (IFS) परीक्षा में देशभर में 91वीं रैंक हासिल कर चर्चा में है। अब वही जंगल, जो कभी उनके परिवार की जीविका का साधन था, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी अजय के कंधों पर होगी।

अजय का बचपन बेहद अभावों में बीता। कच्चे घर में रहने वाला यह परिवार साल के कुछ महीने खेती करता और बाकी समय जंगलों से तेंदूपत्ता व महुआ बीनकर गुजारा करता था। आर्थिक तंगी के बावजूद उनके माता-पिता ने बच्चों की पढ़ाई से समझौता नहीं किया। वे खुद भले ही शिक्षित नहीं थे, लेकिन शिक्षा की अहमियत को भलीभांति समझते थे।
अजय शुरू से ही पढ़ाई में मेधावी रहे। वर्ष 2011 में उन्होंने 10वीं में 93 प्रतिशत अंक हासिल किए, जो उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। तेंदूपत्ता संग्राहक परिवारों के बच्चों के लिए चल रही सरकारी छात्रवृत्ति योजना का लाभ मिलने से उनकी आगे की पढ़ाई आसान हो गई। 12वीं में भी शानदार प्रदर्शन के बाद उन्हें एनआईटी रायपुर में प्रवेश मिला, जहां उन्हें लगातार तीन वर्षों तक छात्रवृत्ति मिलती रही।
एनआईटी में पढ़ाई के दौरान उनका नजरिया बदला और उन्होंने बड़े सपने देखना शुरू किया। पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें कैंपस प्लेसमेंट मिला और वे बस्तर में काम कर रही संस्था ‘प्रदान’ से जुड़ गए। यहां उन्होंने चार वर्षों तक आदिवासी समुदायों के बीच रहकर काम किया और उनके जीवन, आजीविका और जंगल से जुड़ाव को करीब से समझा।
हालांकि, नौकरी के दौरान ही अजय के मन में समाज और पर्यावरण के लिए कुछ बड़ा करने की चाह जगी। उन्होंने नौकरी छोड़कर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की और कड़ी मेहनत के बाद भारतीय वन सेवा में 91वीं रैंक हासिल कर अपने सपने को साकार कर दिखाया।
अजय गुप्ता की यह सफलता न सिर्फ उनके परिवार के लिए गर्व की बात है, बल्कि उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को साकार करने का हौसला रखते हैं।







