Sunday, May 31, 2026

कलेक्ट्रेट में आत्मदाह की कोशिश, प्रशासन की संवेदनहीनता उजागर

मिट्टी तेल से कलेक्ट्रेट में सुसाइड की कोशिश, सामाजिक बहिष्कार से परेशान है ग्रामीणखैरागढ़। जिले के कलेक्ट्रेट परिसर में दिनदहाड़े हुई आत्मदाह की कोशिश ने न सिर्फ प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि यह भी सवाल उठा दिया है कि आखिर पीड़ितों की सुनवाई का दावा करने वाला तंत्र कहाँ विफल हो रहा है। कटंगी, गंडई निवासी अधेड़ व्यक्ति शीतलाल निर्मलकर द्वारा खुद पर मिट्टी तेल डालकर आग लगाने का प्रयास, प्रशासनिक लापरवाही और अनदेखी का भयावह परिणाम माना जा रहा है।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शीतलाल अचानक कलेक्ट्रेट परिसर में पहुँचा और अधिकारियों की मौजूदगी में ही खुद पर मिट्टी तेल उड़ेलकर आग लगाने लगा। कुछ पल के लिए पूरा परिसर सन्न रह गया। समय रहते पुलिसकर्मियों और कर्मचारियों ने उसे रोक लिया, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया। हालांकि इस दौरान वह आंशिक रूप से झुलस गया, जिसे उपचार के लिए जिला अस्पताल भेजा गया है, जहाँ उसकी हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि एक आम नागरिक को अपनी पीड़ा बताने के लिए आत्मदाह जैसा कदम उठाने पर क्यों मजबूर होना पड़ा। शीतलाल का आरोप है कि वह लंबे समय से अपने गाँव में कथित सामाजिक बहिष्कार का शिकार है। कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा उसे और उसके परिवार को सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दिया गया, जिसकी शिकायत वह लगातार करता रहा, लेकिन प्रशासन ने उसकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया।

पीड़ित के अनुसार, सामाजिक बहिष्कार के चलते उसके बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है और परिवार की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर भी संकट खड़ा हो गया है। सवाल यह उठता है कि यदि शिकायतें पहले से प्रशासन के संज्ञान में थीं, तो अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के इंतजार में था?

कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील और सुरक्षित माने जाने वाले परिसर में इस तरह की घटना होना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक तंत्र न केवल जन समस्याओं के समाधान में असफल है, बल्कि मानसिक रूप से टूट चुके लोगों को समय रहते संभालने में भी नाकाम रहा है।

घटना के बाद अधिकारियों द्वारा जांच और कार्रवाई के आश्वासन दिए जा रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल आश्वासन नहीं, बल्कि दोषी जिम्मेदार अधिकारियों और सामाजिक बहिष्कार करने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यदि अब भी मामले को औपचारिकता में निपटाने की कोशिश की गई, तो यह प्रशासन की संवेदनहीनता पर एक और काला धब्बा होगा।

खैरागढ़ की यह घटना एक चेतावनी है कि जब न्याय और सुनवाई के दरवाज़े आम लोगों के लिए बंद हो जाते हैं, तब वे जान जोखिम में डालकर अपनी आवाज़ उठाने को मजबूर हो जाते हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस घटना से कोई सबक लेता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा।